साहब! पैदल न चल देते तो बीमारी से पहले भूख मार देती
गरीबी और बेकारी ने पहले परदेस जाकर रोजी रोटी कमाने को मजबूर किया अब कोरोना ने कदम गांव घर की ओर मोड़ने को विवश कर दिया है। दिल्ली से बड़े पैमाने पर पूर्वांचल, बिहार और नेपाल के रहने वाले दिहाड़ी मजदूर वापस आ रहे हैं। जो खुशनसीब रहे उन्हें तो आनंद विहार बस अड्डे से किसी तरह बस मिल गई लेकिन बड़ी संख्या में लोग पैदल, ठेला, साइकिल और बाइक से ही आ रहे हैं। दिल्ली के एक होटल पर काम करने वाले नेपाल के राजेश थापा ऐसे बदनसीब रहे जिन्हें कोई साधन नहीं मिला।
सात दिन में दिल्ली से पीपीगंज: जनता कफ्र्यू के बाद लॉकडाउन लागू होने के अगले दिन यानी सोमवार की शाम को नेपाल के मीरगंज के रहने वाले राजेश थापा दिल्ली से पैदल ही चल पड़े। सात दिन तक पैदल चलते हुए सोमवार दोपहर 12 बजे पीपीगंज पहुंचे तो भूख से बेहाल थे। पुलिसवालों ने उन्हें खाना खिलाया और फिर टैंकर पर बैठा दिया।
कुछ खुशनसीब भी थे
हालांकि मोतिहारी बिहार के रहने वाले मोहम्मद सबीर भाग्यशाली रहे जिन्हें रास्ते में लिफ्ट भी मिल गई। दिल्ली की एक कपड़ा फैक्ट्री में काम करने वाले सबीर 3 दिन में पहुंच गए। हालांकि यहां से आगे का रास्ता तय करने के लिए वह पैदल ही निकल पड़े। उन्होंने कहा कि वहां तीन महीने के लॉकडाउन की बातें हैं। ऐसे में घर नहीं लौटें तो क्या करें।
लखनऊ से शुक्रवार की रात में पैदल निकले बिहार के गोपालगंज के ठकरहा गांव निवासी कुश लौहर, विरेन्द्र, कमलेश यादव कहते हैं कि साहब, वहां रहता तो बीमारी से पहले भूख ही मार देती।